हर मोबाईल फोन ‘वर्चुअल जुआघर’, ऑनलाइन गेमिंग पर ‘सुप्रीम कोर्ट’ की चिंता समझना क्यूं जरूरी

हर मोबाईल फोन 'वर्चुअल जुआघर', ऑनलाइन गेमिंग पर 'सुप्रीम कोर्ट' की चिंता समझना क्यूं जरूरी

ऑनलाईन गेमिंग और इस की वजह से समाज पर पड़ रहे गलत प्रभावों से सुप्रीम कोर्ट भी अछूता नहीं है। जिस तरीके से अपने देश में ऑनलाइन गेमिंग और बेटिंग प्लेटफॉर्म्स दिन दूनी रात चौगुनी रफ्तार से बढ़ रहे हैं, उसके मद्देनजर शीर्ष अदालत की चिंता, हाल की एक टिप्पणी में साफ झलक रही है। जिसमें कहा गया है कि आज देश का हर मोबाईल एक चलता फिरता वर्चुअल जुआ घर बन गया है।

ऑनलाईन गेमिंग पर सुप्रीम कोर्ट में मामला

इस मामले को औपचारिक रूप से State of Tamil Nadu & Ors. v. Junglee Games India Pvt. Ltd. & Ors. के रुप में जाना गया। हाल ही में 27 मई को सुप्रीम कोर्ट में न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति आर महादेवन की पीठ ने इस ऑनलाईन गेमिंग और बेंटिंग से जुड़े मामले की सुनवाई के बाद एक बड़ी बात कही। बेंच ने कहा कि ऑनलाईन गेमिंग और बेंटिंग प्लेटफार्म ने लगभग देश के हर मोबाईल को एक आभासी आम जुआ घर में बदल दिया है। यह बदलती तकनीकों का बड़ा दुष्प्रभाव है। और यह सार्वजनिक स्वास्थ्य और व्यवस्था के लिए बड़ा खतरा है।

ऑनलाईन गेमिंग पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी और फैसला

  • शीर्ष अदालत ने तथ्यों के आधार पर कहा कि कोर्ट ने कहा कि ऑनलाइन गेमिंग की लत से अवसाद, मानसिक तनाव और आत्महत्या जैसे गंभीर परिणाम सामने आ रहे हैं। फैसले में अदालत ने विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) द्वारा ICD11 में गेमिंग डिसऑर्डर को मान्यता दिए जाने का भी उल्लेख किया।
  • सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि स्मार्टफोन, इंटरनेट और डिजिटल पेमेंट सिस्टम ने जुए को पहले से कहीं अधिक आसान और सुलभ बना दिया है। इसलिए इसे केवल मनोरंजन या व्यवसाय का विषय नहीं माना जा सकता। इसी संदर्भ में कोर्ट ने टिप्पणी की कि आज हर मोबाइल फोन एक वर्चुअल जुआघर बन चुका है।
  • पहले जहां जुआ खेलने के लिए किसी भौतिक स्थान की जरूरत होती थी, वहीं अब मोबाइल फोन के जरिए कोई भी व्यक्ति कुछ ही सेकंड में ऑनलाइन बेटिंग प्लेटफॉर्म तक पहुंच सकता है।
  • इस मामले में तमिलनाडु सरकार ने अदालत के समक्ष तर्क रखा था कि ऑनलाइन गेमिंग की लत के कारण कर्ज, आर्थिक बर्बादी और आत्महत्या जैसी घटनाएं बढ़ रही हैं। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट ने भी माना कि लोगों को जल्दी आर्थिक फायदा का सपना दिखाकर ऐसे प्लेटफॉर्म जोखिम भरे व्यवहार को सामान्य बना रहे हैं।
  • सुप्रीम कोर्ट ने इन दलीलों को गंभीरता से लिया और कहा कि ऑनलाइन मनी गेमिंग का प्रभाव केवल खिलाड़ियों तक सीमित नहीं रहता। परिवारों की आर्थिक स्थिति प्रभावित होती है और समाज में अस्थिरता पैदा होती है।
  • शीर्ष अदालत की ओर से साफ किया गया कि पब्लिक गैंबलिंग एक्ट का मूल उद्देश्य आम जुआघरों को रोकना था, लेकिन तकनीक ने उस चुनौती को पूरी तरह बदल दिया है।
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अदालत के अनुसार, जब किसी गतिविधि का प्रभाव बड़े पैमाने पर लोगों के मानसिक और सामाजिक स्वास्थ्य पर पड़ता है, तब राज्य का हस्तक्षेप उचित और आवश्यक हो जाता है। और अपने फैसले में वास्तविक पैसे के दांव पर राज्य स्तरीय प्रतिबंधों को बरकरार रखा है।

क्या राज्य ऑनलाईन गेमिंग पर प्रतिबंध लगा सकते हैं

इसका जवाब है, हां। राज्यों को अपने अधिकार क्षेत्र में ऑनलाइन गेमिंग और बेटिंग को रोकने के लिए उचित प्रतिबंध बनाने का अधिकार है। जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच ने इस फैसले का वैधता बताते हुए कही कि कहा कि संविधान की सातवीं अनुसूची की सूची II में राज्यों को सार्वजनिक व्यवस्था के विषय पर कानून बनाने का अधिकार प्राप्त है। शीर्ष अदालत का यह फैसला यह तमिलनाडु और कर्नाटक द्वारा अधिनियमित संशोधनों की संवैधानिक वैधता पर लंबे समय से चल रहे कानूनी विवाद का अंत करता है। जिसके जरिए रम्मी, पोकर और फंतासी खेलों सहित पैसे या दांव के लिए खेले जाने वाले ऑनलाइन गेम को अपराध घोषित किया गया है।

फैसले का दूरगामी असर

यह साफ है कि आज के डिजिटल जमाने में इस फैसले का दूरगामी असर से इंकार नहीं किया जा सकता। ऑनलाइन गेमिंग उद्योग के लिए सुप्रीम कोर्ट के फैसले को एक बड़ा झटका माना जा रहा है। लेकिन इस फैसले से सार्वजनिक स्वास्थ्य और व्यवस्था पर बड़ा ही सकारात्मक असर पड़ सकता है। अदालत ने साफ कर दिया है कि डिजिटल तकनीक के युग में जुए और सट्टेबाजी के सामाजिक नकारात्मक असर को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अब राज्य चाहें तो अपने अधिकार क्षेत्र में ऑनलाइन गेमिंग के नियमन और राज्यों की नीतियों को अपने अनुकूल तैयार कर सकते हैं, जो कि सार्वजनिक स्तर पर बड़ा असर डाल सकता है।

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