गोविंद बल्लभ पंत ने लाठीचार्ज में नेहरू को बचाने के लिए खाई लाठियां
राजनीति में आप सबने विरोध, आंदोलन और टकराव की खूब खबरें सुनी, देखी, पढ़ी होंगी. लेकिन क्या आपने कभी सुना है कि कोई नेता जिस आंदोलन में अंग्रेजी हुकूमत की लाठियां खा रहा हो. वही आगे चलकर उत्तर प्रदेश का पहला मुख्यमंत्री बने? ऐसी कहानी बहुत कम लोगों को ही पता हो. ‘UP CM के गजब किस्से’ की इस पार्ट में पढ़िए उत्तर प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री गोविंद बल्लभ पंत की कहानी, जिन्होंने आजादी की लड़ाई में अंग्रेजों की लाठियां झेलीं और बाद में यूपी की सत्ता संभालने वाले पहले मुख्यमंत्री भी बने. लेकिन इससे भी रोचक किस्सा यह है कि वह पंडित जवाहर लाल नेहरू के दौरान लाठीचार्ज में लाठी खाकर घायल हो गए थे. कुछ जगहों पर यह भी कहा जाता है कि नेहरू को बचाने के लिए पंत ने लाठी खाई थी. तो बिना देरी किए जानते हैं पूरी कहानी आखिर मामला क्या था. क्या थी सच्चाई.
कौन थे गोविंद बल्लभ पंत?
गोविंद बल्लभ पंत भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के बड़े नेताओं में शामिल थे. उनका जन्म 10 सितंबर 1887 को उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले के खूंट गांव में हुआ था. कानून की पढ़ाई करने के बाद उन्होंने वकालत शुरू की, लेकिन जल्द ही उनका जुड़ाव देश के स्वतंत्रता आंदोलन से हो गया. पंत कांग्रेस के प्रमुख नेताओं में रहे. उन्होंने अंग्रेजी शासन के खिलाफ आंदोलनों में सक्रिय भूमिका निभाई और कई बार जेल भी गए. आजादी के बाद जब नए भारत में राज्यों की सरकारों का गठन हुआ तो गोविंद बल्लभ पंत को उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी मिली. वह 1946 में संयुक्त प्रांत (बाद में उत्तर प्रदेश) के पहले मुख्यमंत्री बने. लेकिन मुख्यमंत्री बनने से पहले उनकी पहचान एक संघर्षशील नेता की बन चुकी थी.
जब साइमन कमीशन के विरोध में सड़कों पर उतरा लखनऊ
साल 1928 में ब्रिटिश सरकार ने भारत में संवैधानिक सुधारों की समीक्षा के लिए साइमन कमीशन भेजा था. इस कमीशन में एक भी भारतीय सदस्य नहीं था. इसी वजह से देशभर में इसका विरोध शुरू हो गया. हर जगह नारे गूंजने लगे- साइमन गो बैक. लखनऊ में भी काले झंडों के साथ बड़ा प्रदर्शन हुआ. इस आंदोलन में जवाहरलाल नेहरू के साथ गोविंद बल्लभ पंत भी शामिल थे. उस समय पंत मुख्यमंत्री नहीं थे, बल्कि अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे कांग्रेस नेता थे.
30 हजार लोगों की भीड़ पर बरस पड़ी अंग्रेजी पुलिस
जवाहरलाल नेहरू के 30 नवंबर 1928 के प्रेस बयान, नेहरू आर्काइव में मौजूद ऐतिहासिक दस्तावेजों और सेलेक्टेड वर्क्स ऑफ जवाहरलाल नेहरू (प्रथम सीरीज) में इस घटना का विस्तार से जिक्र मिलता है. इसके मुताबिक, 29 नवंबर 1928 की सुबह लखनऊ में साइमन कमीशन के विरोध में हजारों लोग सड़कों पर उतर आए थे. नेहरू ने अपने बयान में लिखा कि लखनऊ में करीब 30 हजार या उससे ज्यादा लोगों की भीड़ मौजूद थी. प्रदर्शनकारी हाथों में काले झंडे लेकर साइमन कमीशन के विरोध में आगे बढ़ रहे थे. प्रशासन चाहता था कि प्रदर्शनकारियों को उस रास्ते से दूर रखा जाए, जहां से साइमन कमीशन गुजरने वाला था. हालांकि, आंदोलनकारी इतनी दूर जाकर प्रदर्शन करने के लिए तैयार नहीं थे. उनका कहना था कि वहां से विरोध दर्ज कराने का कोई असर नहीं होगा. जुलूस शांतिपूर्ण तरीके से अपनी जगह खड़ा रहा, लेकिन कुछ ही देर बाद हालात बदल गए.
जब अंग्रेजों की लाठियां बरसने लगीं
नेहरू ने अपने बयान में बताया कि अचानक करीब 100 घुड़सवार और पैदल पुलिसकर्मी प्रदर्शनकारियों की ओर बढ़े और हमला शुरू कर दिया. पुलिस ने भीड़ को हटाने के लिए लाठीचार्ज कर दिया. घोड़ों को दौड़ाया गया और प्रदर्शनकारियों पर जमकर लाठियां बरसाई गईं. इस हमले में बड़ी संख्या में लोग घायल हुए. इसी लाठीचार्ज में गोविंद बल्लभ पंत भी घायल हुए. नेहरू ने लिखा था कि मुख्य जुलूस में उनके साथ पंडित गोविंद बल्लभ पंत और लखनऊ कांग्रेस के अन्य नेता मौजूद थे.
नेहरू को बचाने के लिए छात्रों ने बना लिया था सुरक्षा घेरा
लाठीचार्ज के दौरान जवाहरलाल नेहरू को भी लाठियां लगीं. नेहरू ने अपने बयान में लिखा कि दो-तीन लाठी लगने के बाद कुछ छात्रों ने उन्हें चारों तरफ से घेर लिया. इन छात्रों ने कहा कि वे नेहरू को बचाने के लिए खुद चोट सहने को तैयार हैं. कई छात्र इस कोशिश में गंभीर रूप से घायल भी हुए. इन युवाओं ने नेहरू के साथ मौजूद गोविंद बल्लभ पंत और मिसेज मित्रा को भी बचाने की कोशिश की. यह घटना उस दौर की राजनीति की तस्वीर दिखाती है, जब नेता और कार्यकर्ता खुद आंदोलन की पहली कतार में खड़े होकर अंग्रेजी हुकूमत का सामना करते थे.
अंग्रेजों की लाठियां खाने वाला नेता बना यूपी का पहला मुख्यमंत्री
आजादी के बाद गोविंद बल्लभ पंत का राजनीतिक सफर नई ऊंचाइयों तक पहुंचा. साल 1946 में वह उत्तर प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री बने. उन्होंने करीब नौ साल तक प्रदेश की कमान संभाली. इसके बाद वह केंद्र सरकार में गृह मंत्री भी बने. लेकिन मुख्यमंत्री बनने से पहले ही पंत अपनी पहचान एक ऐसे नेता के तौर पर बना चुके थे, जिन्होंने आजादी की लड़ाई में संघर्ष किया और अंग्रेजी शासन के खिलाफ मजबूती से खड़े रहे. यानी जहां आज के दौर में राजनीति में मुख्यमंत्री पद को अक्सर सत्ता और प्रशासन से जोड़कर देखा जाता है. लेकिन गोविंद बल्लभ पंत की कहानी बताती है कि कई नेता कुर्सी तक पहुंचने से पहले संघर्ष के रास्ते से गुजर चुके थे. यही वजह है कि गोविंद बल्लभ पंत का नाम उत्तर प्रदेश के इतिहास में सिर्फ एक मुख्यमंत्री के रूप में नहीं, बल्कि संघर्ष से निकले जननेता के तौर पर दर्ज है.







